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Showing posts from November, 2018

स्वयं स्वच्छ

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स्वच्छ भारत! हमारा सपना जाने कब पूरा होगा? परंतु भारत कौन है? अरे! हम सबसे ही तो भारत है हम चाहें तो कल ही स्वच्छ सवेरा होगा। ईश्वर को ढूँढने वालो भटकने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि स्वच्छता है जहाँ वहाँ ईश्वर होता है। स्वच्छता में ही ईश्वर का बसेरा होगा। स्वस्थ रहेंगे अगर हम सब खुशियों का संचार होगा स्वच्छता को जीवन में लाकर जीवन का उद्धार होगा। सबकुछ जान चुके हैं हम  किंतु, जानना है एक सच स्वच्छता की अगर चाहत है तो बनना होगा स्वयं स्वच्छ। — रिज़वान रिज़

वो प्यारी मुस्कान

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ठोकर लगी तो थी किंतु, लगने का एहसास न हुआ वो प्यारी-सी मुस्कान मानों मेरी रक्षक थी। मदद थी या जीत थी वो मेरी पहचान न पाया मैं ईश्वर की उपस्तिथि की पहचान थी शायद। सहारा मिल गया था आगे बढ़े जा रहा था मैं हृदय में मगर वही प्यारी मुस्कान थी विषय नहीं था अब चिंता का भय की कोई बात न थी दुःख तो सिर्फ़ इतना ही था मंज़िल तो थी पर.. वो प्यारी मुस्कान न थी। — रिज़वान रिज़

तुम

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मैं जानता हूँ कई मायनों में तुम अलग हो मुझसे.. तुम्हारी भाषा, तुम्हारे तौर-तरीके काफ़ी जुदा हैं, मेरे ख़्यालों से.. मगर फिर भी दिल को लगता है तुम सचमुच इतने अनजाने नहीं। बेशक़ तुम्हारा रंग-रूप मेल नहीं खाता है मेरे चेहरे से और न ही मैं ख़ूबसूरत हूँ तुम जितना मगर फिर भी दिल को लगता है तुम सचमुच इतने अनजाने नहीं। मैं नहीं हूँ तुम जैसा उम्दा फ़ोटोग्राफर मगर मैं तुम्हारे चेहरे को अक्सर रखता हूँ अपनी आँखों में.. क्योंकि इन्होंने खींच ली है संसार की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर। — रिज़वान रिज़