Posts

Showing posts with the label रिज़ की शायरी

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए, कोई कविता लिखे। कोई गीत सुने, कोई ख़्वाब बुने। बहुत दिन हुए। हर कविता, गीत और ख़्वाब। एक नई ज़िंदगी है। बहुत दिन हुए, जिंदगी जिए। — रिज़वान रिज़

चला जाने वाला शख़्स By Rizwan Riz

Image
चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। इस दुनिया से चले जाने के बाद। उसके बोलने-सुनने रहने-सहने, कुछ कहने चलने-फिरने, खाने-पीने ज़िंदगी जीने और कभी-कभी तो मरने का अंदाज़ हर एक जीवित शख़्स को इतना पसंद आता है इतना पसंद आता है कि मानों वो शख़्स नहीं कोई अवतार या कोई चमत्कार हो। हर घर-गली-मुहल्ले में होती हैं चर्चाएँ उसकी हर सामान्य-सी बात को उसका अनूठा गुण बताते हुए। लोग थकते भी नहीं हैं उसके क़िस्से सुनाते हुए। इसलिए अक्सर ऐसा लगता है। चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। - रिजवान रिज़

वो शख़्स कभी हमारा था By Rizwan Riz

Image
एक उम्मीद थी सहारा था। वो शख़्स कभी हमारा था। उसके सिवा कुछ देखा नहीं था। कितना साफ़ दिल हमारा था। उसके चेहरे पे इक उदासी थी। बहुत परेशान दिल हमारा था। उसके दिल में रहना चाहते थे। फ़क़त यही एक घर हमारा था। उसकी ज़ुल्फें संवारा करते थे। ख़ूबसूरत काम हमारा था। उसके चेहरे में एक कशिश थी। और ये आईना हमारा था। उसे आँखों में लेकर चलते थे। वो ख़ूबसूरत ख़्वाब हमारा था। जैसा तुम्हारा ख़्वाब है ‘रिज़वाँ’ एक ऐसा ही सच हमारा था। - रिज़वान रिज़

हर शख़्स में बस तू नज़र आता है By Rizwan Riz

Image
हर शख़्स में बस तू नज़र आता है वो अलग बात है तू नज़र नहीं आता। लगता है तू मेरा था, मेरा ही तो था वरना उम्र भर यूँ याद नहीं आता। वो कहता है कि अब मेरा नहीं है वो उसे अपना ही साया नज़र नहीं आता। तू लाख बार मुकर जा अपने वादे से मुझे अपने वादे से मुकरना नहीं आता। उसके आँगन में जश्न-ए-ईद का माहौल है हम अभागो को चंदा नज़र नहीं आता। हम ही इश्क़ से पर्दा कर गए 'रिज़वाँ' मेरे बुलाने पर, क्या वो नहीं आता ? -रिज़वान रिज़

दिल का हाल रो-रोकर बताना हम न छोड़ेंगे By Rizwan Riz

Image
दिल का हाल रो-रोकर बताना हम न छोड़ेंगे तुम्हारी याद में आँसू बहाना हम न छोड़ेंगे। तू किसी और की तकदीर है ये जानते हैं हम हम फ़क़त तेरे दीवाने हैं बताना हम न छोड़ेंगे। तुम्हारे इश्क़ में हमने बस इतना ही पाया है तुम्हीं से ये ज़माना है ज़माना हम न छोड़ेंगे। तुम जा रहे हो छोड़कर ये जान लो लेकिन तुम्हारे दूर जाने से मुहब्बत हम न छोड़ेंगे। तुम्हें हर वक़्त हर लम्हा, हमारी याद आएगी तुम्हारा नाम हर लम्हा दोहराना हम न छोड़ेंगे। उदासी ये छुपाने को हम दिन में सोयेंगे लेकिन तुम्हारी याद में रातों को जगाना हम न छोड़ेंगे। तुम आख़िर हो क्या मेरे क्यूँ इतना सताते हो गर हम भी तुम्हारे हैं सताना हम न छोड़ेंगे। जानते हैं न आओगे अब तुम लौटके 'रिज़वाँ' तुम्हारी यादों से पर दिल लगाना हम न छोडेंगे। - रिज़वान रिज़

चलो कुछ इस तरह से गुज़ारा करते हैं

Image
चलो कुछ इस तरह से  गुज़ारा करते हैं। तुम नफ़े में रहो हम ही ख़सारा करते हैं। मेरे कुछ और करीब आ जाओ ऐं सनम। आज करीब से चाँद का नज़ारा करते हैं। वो जब रुख़ अपना मेरे ज़ानु पे रखते हैं। हम उनकी बिखरी ज़ुल्फें सँवारा करते हैं। इक पल भी नहीं रह पाता मैं बग़ैर उसके लोग जाने कैसे पूरी उम्र गुज़ारा करते हैं। यकीनन वो सिम्त हमारी ही हो जाती है। जिस तरफ़ हम ज़रा-सा इशारा करते हैं। झुक जाए जो सिर किसी शैतान के आगे ऐसी ज़िंदगी से हम मरना गवारा करते हैं। सचमुच इतनी कड़वी है  ज़ुबाने 'रिज़वाँ' कई चमचे इसके आगे किनारा  करते हैं। — रिज़वान रिज़

यक़ीनन हमें तुमसे नफ़रत नहीं है By Rizwan Riz

Image
यक़ीनन  हमें  तुमसे  नफ़रत नहीं हैं। मगर दिल को तुमसे मुहब्बत नहीं है। हमें  इश्क़  है  बस  हमारे  सनम  से। किसी  और की अब ज़रूरत नहीं है। बैठे  हैं  कब से  हम राहों में  जिनकी। उन्हें हमसे मिलने की मोहलत नहीं है। अमीरों की बस्ती चमकती गलियों में। ग़रीबों को आने की  इजाज़त नहीं है। माना  कि  कांधों पर  बोझ  बहुत  है। मुझे  सिर  झुकाने  की आदत नहीं है। झूठ  को  बेचके , सच  खरीदने वाले। बेईमानों  के  घरों  में  बरकत  नहीं है। तेरे जिस्म से हम बेबसी  में  हैं लिपटे। ये  सच्ची  मुहब्बत है  वहशत  नहीं है। मरते  रहे   हैं   जो  हरदम  वतन  पर। उन्हीं  के  दामन  में  शोहरत  नहीं  है। तू  है  बादशाह फ़क़त  इक  महल का। तू...

मुझे इस हाल में होने दो न By Rizwan Riz

Image
मुझे इस हाल में होने दो न। जी  भर के  तुम रोने दो न। यूँ आराम मिले दो पल का। अपनी बाहों में  सोने दो न। बिखर रही साँसें, मोती-सी। इनकी इक माला पोने दो न। जिससे कोई  प्रेम उग  सके। वो बीज मुझे तुम बोने दो न। तनहा होने  में डर लगता है। भीड़ में मुझको  खोने दो न। तुम अब बस मेरी हो जाओ। मुझको अपना  होने  दो  न। आओ पहले मिलन करें हम। जो होता है, अब होने दो न। - रिज़वान रिज़ **ख़ुद के हाथों पे यक़ीन करो।     सोई तकदीर को सोने दो न।

कुछ तुम कुछ हम दूर हो गए By Rizwan Riz

Image
कुछ तुम कुछ हम दूर हो गए। वक़्त के हाथों मज़बूर हो गए। अंधेरी रात में देखे सपने कई। उजाले में सब चूर-चूर हो गए। मैं उनको मनाता कैसे आख़िर। वो दौलती अब मग़रूर हो गए। शौक़ तो हमें भी था जीने का। इन्सां थे मौत का दस्तूर हो गए। -रिज़वान रिज़

इंतेज़ार By Rizwan Riz

Image
हम कबसे आस लगाए बैठे हैं। वो अबतक मुँह फुलाए बैठे हैं। काश.! वो आएँ मिलने और हाल पूँछें हमारा उनके इंतेज़ार में हम पलकें बिछाए बैठे हैं। यूँ लगता है मेरी गली से न आएँगे वो इस क़दर खफ़ा हैं मुझसे वो। उनके  स्वागत की ख़ातिर हम पड़ोस की गली सजाए बैठे हैं। दिल कहता है आएँगे वो फिर कहता है शायद न भी आएँ।  बस इसी उलझन में हम घबराए बैठे हैं। अरसा हुआ अब तो उनसे मिले ‛रिज़वाँ' न जाने किस बात को वो दिल से लगाए बैठे हैं। हम कब से आस लगाए बैठे हैं। वो अब तक मुँह फुलाए बैठे हैं। - रिज़वान रिज़

इक रोज तुम मिले थे By Rizwan Riz

Image
इक रोज तुम मिले थे अजनबी बनके। और अब तुम ही तुम हो ख़्वाबों और हक़ीक़त में। मेरे अपनों में और सपनों में। अब तो तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दहर। तुम ही तुम बस नज़र आते हो मैं देखता हूँ जिधर। अँधेरों में, उजालों में। मेरे ख़्यालों में बस तुम ही तुम हो..। -रिज़वान रिज़ आभार : गूगल प्ले, कुकू एफ एम।

चलते हैं जब कभी तनहा By Rizwan Riz

Image
चलते हैं जब भी कभी तनहा तेरी याद आ जाती है पहले तो मुस्कुराते हैं हम फिर उदासी छा जाती है। हर बार सोचता हूँ भूल जाऊँ अब तुझे ज़रा-सी देर नहीं होती कोई न कोई तेरी अदा याद आ जाती है। चलती है जब भी कभी अँधरे में ठंडी हवा तेरे साथ वो बरसात की रात याद आ जाती है। कभी खोलता हूँ कभी बंद करता हूँ आँखे सोचता हूँ राहत मिलेगी तेरी यादों से पर तू तो जैसे कोई ख़्वाब है नींदों में आ जाती है। निकलते हैं रोज़ दीदार-ए-मेहबूब की ज़ानिब कोई न कोई आफ़त रस्ते में आ जाती है अब तो यूँ जी रहे हैं अरसों से "रिज़वाँ" कभी-कभी नहीं आती कभी साँस आ जाती है। -रिज़वान रिज़

उदास हर दिन हर शाम तनहा-तनहा है By Rizwan Riz

Image
उदास हर दिन, हर शाम तनहा-तनहा है किस तरह बताएँ अब, रात का आलम। हर तरफ़ तुम हो बस, कुछ और नहीं है हम नहीं जानते, क़ायनात का आलम। जब कोई हँसता है, तुम महसूस होते हो यहाँ तक है तुम्हारी, मुस्कान का आलम। न कोई सावन, न बहार बाक़ी है अब दिल क्या जाने किसी, बरसात का आलम। अगर तुम मिलो तो, हर ग़म जुदा हो तुम क्या जानो 'रिज़वाँ' मुलाक़ात का आलम। -रिज़वान रिज़

दिल के राज़ खुलकर बताता कौन है By Rizwan Riz

Image
दिल के राज़ खुलकर, बताता कौन है। बेवज़ह  की उलझन, बढ़ाता  कौन है। झूठे  चेहरे अक्सर  मीठी बातें करते हैं। ज़ख्म पे सच्चा मरहम लगाता कौन है। ग़नीमत है अभी तक तो सब ख़ामोश हैं। देखना है, मेरे दर्द पे  मुस्कुराता कौन हैं। कोई चेहरा न याद बाक़ी है अब ज़हन में। हर रात मेरी नींदों में, फिर आता कौन है। बड़ा नाबाक़िफ़ है वो, ख़ुदा की ख़ुदाई से। पूँछता है के, दुनिया को  चलाता कौन है। तुम  यहाँ से जाओ, या जहाँ  से 'रिज़वाँ' भला किसी के लिए आँसू बहाता कौन है। -रिज़वान रिज़

हम तो टूट ही चुके हैं By Rizwan Riz

Image
हम तो टूट ही चुके हैं, इसे तो जुड़ा रहने दो मुफ़्त में सूख जाएगा डाली से लगा रहने दो। बेशक़ मर रहा हूँ मगर ज़िंदा भी उसी से हूँ उसका भूत मेरे सिर पे चढ़ा रहने दो। उसकी ख़ुशबू मुझे बुलाती है यहाँ बार-बार कुछ देर और मुझे यहाँ खड़ा रहने दो। मैं एक को मनाता हूँ दूसरा रूठ जाता है इससे बेहतर है जो सड़ा है सड़ा रहने दो। तकल्लुफ़ नहीं ये हमारे यहाँ का रिवाज़ है मेरे बड़े अभी बैठे हैं मुझे खड़ा रहने दो। ये लोगों की दुनिया है आख़िर 'रिज़वाँ' कोई कुछ भी कहे उसे कहता रहने दो। -रिज़वान रिज़

इस तरह इंसानियत की हार नहीं होती By Rizwan Riz

Image
इस  तरह  इंसानियत की हार नहीं होती अच्छा होता मुल्क़ में सरकार नहीं होती। मेरा दुश्मन कभी मुझको जाँ से प्यारा था जंग से पहले,  वरना मेरी हार नहीं होती। वो घर अक्सर मुहब्बत की गवाही देते हैं जहां आँगन के बीच में दीवार नहीं होती। ज़रूर कोई ख़बरी है हमारे बीच में वरना ज़रा-ज़रा-सी बातें यूँ अख़बार नहीं होतीं। हम शायर हैं, सिर्फ़ कलम से वास्ता हमको शायरों के हाथ में कभी तलवार नहीं होती। आसाँ मत समझो सफ़र-ए-ज़िंदगी 'रिज़वाँ' कोई राह मुसाफ़िर की वफ़ादार नहीं होती। -रिज़वान रिज़ ***Poetry contains writer's views not targets any political party or sentiments.

इस तरह तो ज़िंदगी नहीं जी सकते By Rizwan Riz

Image
इस तरह तो ज़िंदगी नहीं जी सकते। ऐं मौत! हम तेरे बिना नहीं जी सकते। ताउम्र हमें बस तेरा इंतेज़ार ही रहा है। आजाओ के अब और नहीं जी सकते। ये सच्ची ज़ुबाँ हैं इस दिल में बग़ावत है। देखके सबकुछ होंठों को नहीं सी सकते। बेचारे समंदरों की ज़रा बेबसी तो देखो। सदियों से प्यासे हैं, पानी नहीं पी सकते। ©  रिज़वान रिज़

इश्क़ की राह में सबकुछ लुटाना पड़ता है By Rizwan Riz

Image
इश्क़ की राह में सबकुछ लुटाना पड़ता है ख़ुश्क आँखों से दरिया बहाना पड़ता है। दीदार-ए-महबूब रोग ही कुछ ऐसा है वो बुलाएं न बुलाएं, हमें जाना पड़ता है। डर रहता है आँखें कहीं नम न हो जाएं रो-रो के उनकी छाती कहीं कम न हो जाए। उनके लबों की मुस्कुराहट की ख़ातिर दर्द-ए-दिल में भी हमें मुस्कुराना पड़ता है। मुहब्बत में मज़ा बहुत है, ये खेल निराला है इसमे कभी रूठना कभी मनाना पड़ता है। रातभर छिपाते हैं राज़-ए-दिल उनसे सहर नहीं होती कि, सबकुछ बताना पड़ता है। उनकी हर बात सिर-आँखों पे होती है अनचाही बातों को भी अपनाना पड़ता है। ज़िंदगी से कोई वादा हो तो मुकर भी जाएं वादा-ए-वफ़ा हो तो, हरगिज़ निभाना पड़ता है। हम जानते हैं मुहब्बत और ज़हर में फ़र्क 'रिज़वाँ' मगर पिलाने वाला अपना हो तो.. इस बारीक़ी को ज़रा छिपाना पड़ता है। -रिज़वान रिज़

नफरतों के दौर में मुहब्बत का रहना मुश्क़िल है By Rizwan Riz

Image
नफरतों के दौर में मुहब्बत का रहना मुश्क़िल है। झूठ चीखना आसाँ है, सच कह देना मुश्क़िल है। तेरी-मेरी ये प्रेम-कहानी अब कहाँ टिक पाएगी। प्रेम बदलना आसाँ है, धरम बदलना मुश्क़िल है। ग़म मनाने का तरीका इस तरह से बदल चुका है। रो देना ही काफ़ी है अब, आँसू लाना मुश्क़िल है। सच्चाई और कलाकारी में बस इतना-सा फ़र्क है। बात बताना आसाँ है, ज़ज्बात बताना मुश्क़िल है। तुम मेरे प्यारे सपनों की प्यारी-सी शहज़ादी हो। तुमको चाहना आसाँ है, तुमको पाना मुश्क़िल है। कभी-कभी तन्हाई में जब याद किसी की आती है। तन्हा हो करके भी ख़ुद को तन्हा पाना मुश्क़िल है। इश्क़ के दरिया में तुम 'रिज़वाँ' इस तरह डूबे हो। डूब ही जाना बेहतर है, पार पे आना मुश्क़िल है। - रिज़वान रिज़

इक-इक करके बाँटा था जो By Rizwan Riz

Image
इक-इक करके बाँटा था जो, हर पल जैसे बर्बाद हुआ भीड़ में कितने तनहा थे हम, आज हमें अहसास हुआ। लरज़ रही थीं दीवारें जब, अनजान बने हम बैठे थे पूरा घर ही बिखर गया तब, हमको ये एहसास हुआ। मीठी बातें वो भोलापन, तुम सचमुच कितने अच्छे थे तुमसे झगड़के बैठ गए तब, हमको ये अहसास हुआ। रोये-धोये, चिल्लाये हम, पूरा घर भी देख लिया इक छोटी-सी आहट में, हमको तेरा एहसास हुआ। झूठी कसमें झूठे चेहरे आख़िर, कितने चलने वाले थे ख़ुद आईने ने बतलाया तब, हमको ये अहसास हुआ। मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर, सारे  जाकर देख लिए आख़िर दिल में झाँका तो, अल्लाह तेरा एहसास हुआ। पूरी ज़िंदगी यूँही गुज़री, सामान-ए-आख़रत कुछ भी नहीं कब्र में जाकर लेटे 'रिज़वाँ', तब हमको ये एहसास हुआ। -रिज़वान रिज़