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Showing posts with the label रिज़ की कविता

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए, कोई कविता लिखे। कोई गीत सुने, कोई ख़्वाब बुने। बहुत दिन हुए। हर कविता, गीत और ख़्वाब। एक नई ज़िंदगी है। बहुत दिन हुए, जिंदगी जिए। — रिज़वान रिज़

गुलिस्तान

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  न चाहकर भी एक उदासी में रहता हूं। मैं इन दिनों बड़ी मुसीबत में रहता हूं। पूरी दुनियां नफ़रतों में मुब्तला है। हर तरफ़ बर्बादियों का सिलसिला है। लोग बड़ी आसानी से लोगों को मार देते हैं। घरों, दुकानों, इबादतगाहों और गुलिस्तानों को उजाड़ देते हैं। हर सिम्त बस नफ़रत नज़र आती है। फिर तेरी सूरत भी याद आती है। — रिज़वान रिज़

दौर-ए-मुश्किल

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सुब्हों-शाम नज़र आता है। हर शख़्स परेशान नज़र आता है। अब ख़बर कोई सुनाता ही नहीं। सब वीरान नज़र आता है। अजीब दौर-ए-मुसीबत है। सिर्फ़ नुकसान नज़र आता है। कितनी भी  कोशिशें कर लो। सब नाकाम नज़र आता है। हम ऐसे दौर-ए-इंसां में हैं जहाँ मुश्किल से कोई इंसान नज़र आता है। — रिज़वान रिज़

चला जाने वाला शख़्स By Rizwan Riz

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चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। इस दुनिया से चले जाने के बाद। उसके बोलने-सुनने रहने-सहने, कुछ कहने चलने-फिरने, खाने-पीने ज़िंदगी जीने और कभी-कभी तो मरने का अंदाज़ हर एक जीवित शख़्स को इतना पसंद आता है इतना पसंद आता है कि मानों वो शख़्स नहीं कोई अवतार या कोई चमत्कार हो। हर घर-गली-मुहल्ले में होती हैं चर्चाएँ उसकी हर सामान्य-सी बात को उसका अनूठा गुण बताते हुए। लोग थकते भी नहीं हैं उसके क़िस्से सुनाते हुए। इसलिए अक्सर ऐसा लगता है। चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। - रिजवान रिज़

काश! तुम हमारे होते By Rizwan Riz

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काश! तुम हमारे होते। हम पूरे हो जाते। मुक़म्मल हो जाते कई सफर। कई  ख़्वाब पूरे हो जाते। काश! तुम हमारे होते। हमें फिर कोई आस न होती किसी और की तलाश न होती। किसी से मिलन की चाह न रहती आँखों में कोई भी राह न रहती। ख़ुद हम भी बस तुम्हारे होते। काश! तुम हमारे होते। और हम इतने उदास न होते। तन्हाई के साथ न रहते। वक़्त भी कितना प्यारा होता हम भी तुम्हारी बाहों में सोते। काश! तुम हमारे होते। - रिज़वान रिज़

इतना भी क्या सोच रहे हो? By Rizwan Riz

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इतना भी क्या सोच रहे हो? क्या तुम भी वो ही सोच रहे हो? मैं तो तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? रूठो मत, मैं भी मान गया हूँ। बैचैनी पहचान गया हूँ। चलो, चलो मन हल्का करलो। मुझको अपनी बाहों में भर लो। अब नीचे तुम क्या देख रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। छोड़ो, चलो अब शर्माना। उल्टे-सीधे चेहरे बनाना। मुझको सब मालूम है। तुम क्या-क्या सोच रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। इतनी बड़ी कोई बात नहीं है। चुप रहने की बात नहीं है। कब से लब ख़ामोश हैं तुम्हारे बस आँखों से ही बोल रहे हो। मैं भी तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? -रिज़वान रिज़

दिन गुज़र रहे थे By Rizwan Riz

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रातें बीत रहीं थीं दिन गुज़र रहे थे किसी की जुदाई में हम धीरे-धीरे मर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. चाहते थे कुछ कहना कुछ बताना उनको अपने बारे में वो किसी और का ज़िक्र कर रहे थे, हँसकर.. हम सब्र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. सब मशरूफ थे अपने-अपने कामों में कोई सँवरता था किसी के लिए कोई मचलता था किसी के लिए कोई तड़पता था किसी के लिए तो कोई लिखता था किसी के लिए पूरी दुनिया चल रही थी हम यूँ ही गुज़र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. हर शख़्स ख़ूबसूरत चारों तरफ मुहब्बत तन्हाई में इक हम कितनी हसीन दुनिया में पल-पल बिखर रहे थे। रातें बीत रहीं थीं और दिन गुज़र रहे थे.. -रिज़वान रिज़

रिज़ By Rizwan Riz

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तुम्हें पता भी न चलेगा। और टूट जाएगा वो। एक तारा। जिसे तुम रिज़ कहती थीं। फिर कोई नया तारा होगा। तुम्हारे साथ। इस आकाश-रूपी  जीवन में। -रिज़वान रिज़

नई उम्मीदें By Rizwan Riz

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हर सुबह लेकर आती है नई उम्मीदें नई खुशियाँ। नए सपने नए कसमें। नए वादे नए इरादे। नए धोखे नए मौके। नए चेहरे नए पहरे। नए काम नए दाम। नई ख्वाइशें नई कोशिशें  नई सफलताएँ नए मायूसियाँ। नई मुलाक़ातें नए इंतेज़ार। नई नफ़रतें नया प्यार। नई ख़बरें नए-नए अख़बार। और नई सम्भावनाएँ अगली सुबह होने की। - रिज़वान रिज़

महबूब शहर.. दिल्ली By Rizwan Riz

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मैं केवल तुमसे प्यार नहीं करता। तुम्हारे शहर से भी उतनी ही मुहब्बत करता हूँ, जितनी तुमसे। ये बात मुझे आज ही रेलवे-स्टेशन पे पता चली। हालांकि ऐसा सुनना तुम्हें अच्छा न लगे। मगर मुझे आज दिल्ली को छोड़ते हुए ऐसा ही महसूस हो रहा है। मुझे समझ नहीं आता किसका ग़म ज़्यादा है, तुमसे दूर होने का या दिल्ली के छूट जाने का। ख़ैर, ये शहर भी तो तुम्हारा ही है। तुम्हारी बहुत-सी यादें, बहुत-सी बातें हमारा बचपन, और ज़िंदगी का एक शायद सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा छुपा है, इस दिल्ली में। और क्या तुम जानती हो इतनी सारी यादों, कहानियों और अनुभव के बाद  मेरा दिल भी दिल्ली जैसा हो चुका है। तुम चाहो तो इसमें आकर रह सकती हो ये भी तो आख़िर तुम्हारा ही घर है। - रिज़वान रिज़

शिकायत है By Rizwan Riz

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राम को रहीम से और रहीम को राम से शिकायत है। होनी भी चाहिए क्योंकि ये दोनों बरसों-बरस के साथी रहे हैं। ऐसे साथी जिनको एक-दूसरे से अलग कर पाना मुश्क़िल है। उतना ही मुश्क़िल, जितना ख़ुद को ख़ुद से अलग करना। मगर आज राम ने रहीम को, रहीम न कहकर मुसलमान कह दिया और रहीम भी उसको हिंदू कहते हुए दूसरी तरफ जाकर बैठ गया है। अब दोनों इस बात को सोच रहे हैं कि हम दोनों को आख़िर हिंदु-मुसलमान किसने बना दिया, हम तो बरसों से केवल राम और रहीम थे। - रिज़वान रिज़

सब याद रक्खा जाएगा By Rizwan Riz

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ये नफरतें, मुहब्बतें ये सिरफिरी सियासतें। ये दूरियाँ, मज़बूरियाँ ये दुःखद कहानियाँ। सब याद रक्खा जाएगा। अमीर लोग, ग़रीब लोग भूखे लोग, प्यासे लोग तड़पते लोग, बिलखते लोग मज़दूर लोग, मज़बूर लोग और सड़को पे दम तोड़ते लोग सब याद रक्खा जाएगा। ये नम आँखे मासूमों की ये नन्हें पैरों में छाले। सपने लिए घर जाने के ये भूखे पेट, प्यासे गले। ये बेबसी, ये बे-क़दरी और ये सरकारों की चुप्पी सब याद रक्खा जाएगा। ये झूठे वादों की सरकार ये नफ़रतों से भरे अख़बार ये दलाली करती मीडिया सच छुपाती, झूठ दिखाती नफ़रत फैलाती मीडिया। और आग लगाती मीडिया। सब याद रक्खा जाएगा। - रिज़वान रिज़

लौट आना आसान होता है By Rizwan Riz

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लौट आना आसान होता है उस वक़्त जब कोई देखता हो राह तुम्हारी और जलाये रखता हो इक दिया वापसी की उम्मीद में तुम्हारे लौट आने की। और भी आसानी हो जाती है वापसी में जो वो अगर ढूँढता आ जाए तुमको तुम तक और कहे प्यार से. आओ फिर से देखते हैं सपने साथ-साथ। -रिज़वान रिज़

सुबह फिर होगी By Rizwan Riz

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इस अंधियारी रात के बाद सुबह फिर होगी। सब्र करो, हिम्मत रखो सुबह फिर होगी। फिर लगेंगे खुशियों के मेले दौड़ेंगी फिर से ये ठहरी हुई सड़कें फिर से घूमेंगे हम-तुम लिए हाथों में हाथ अपनी पसंद के शहरों में। फिर से करेंगे इबादत हम मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों में। फिर से रौनकें आएंगी वापस सूनसान पड़े इन शहरों में। फिर से होगा वो ही मन्ज़र जिसका हम तुमको है इन्तेज़ार। बस कुछ और सब्र करो यक़ीन रखो, दोपहर के बाद शाम और शाम के बाद रात के होने पर। यक़ीन रखो अपने रब पर। सुबह फिर होगी.. - रिज़वान रिज़ #WeWillDefeatCorona

सच क्या है ? By Rizwan Riz

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सच क्या है ? कभी सोचा है। कभी-कभी जो दिखता है वो सच नहीं होता है। और सच छुप जाता है किसी अँधेरे के पीछे। मैंने कई ऐसे लम्हों का अनुभव किया है जब सच बहुत परे था मेरे वाले सच से। और अफ़सोस कि सच भी सदा रहता नहीं एक सभी के लिए ये बदलता है काल-देश और इंसान-दर-इंसान। जब हम नहीं बैठा पाते हैं सामंजस्य एक सच के साथ तो बना लेते हैं एक और नया सच। मैं सोचता हूँ कई बार कि सचमुच ये सच क्या है ? पर अक्सर सच बताने वाले ही होते हैं सच से कोसों दूर और करते हैं झूठी बातें किंतु वो सच है उनके लिए। सचमुच, सच तो कुछ भी नहीं ये तो है बस समय और परिस्थितियों का सामंजस्य। -रिज़वान रिज़

रुक जाना मत By Rizwan Riz

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राहें बहुत कठिन मिलेंगी देख उन्हें घबराना मत। मंज़िल को पाने से पहले देखो तुम रुक जाना मत। अपना सपना ज़िंदा रखना सपने से ध्यान हटाना मत। वक़्त का कोई विकल्प नहीं इसको व्यर्थ गँवाना मत। पहले तुम मेहनत कर लेना किस्मत को अजमाना मत। जीवन में दुःख के पर्वत होंगे अपना शीश झुकाना मत। नदियाँ बहतीं झूठ की यहाँ इनमें डूब के जाना मत। दुनिया तुमपे हँसेगी पक्का इसकी हँसी से शर्माना मत। बहुत मिलेंगे भटकाने वाले उनकी बातों में आना मत। तुमसे तुम्हारा ध्यान हटाएँ ऐसे लोगों में जाना मत। अपने मन की भी सुन लेना औरों की राय में आना मत। तुम सबकुछ कर सकते हो। किसी से आस लगाना मत। जब तुम मंज़िल को पा लो रस्तों को भूल जाना मत। मेरी कविता एक सबक़ है इसको भूल जाना मत। © रिज़वान रिज़

पहला स्पर्श By Rizwan Riz

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कितना नया और अनोखा था, बिल्कुल बारिश की बूँदों-सा पवित्र तुम्हारे और मेरे हाथों का पहला स्पर्श। जैसे ओंस की दो बूँदें सरकती हुई आ मिलती हैं इक-दूजे से, किसी पत्ते पर और जैसे मिल ही जाती हैं सागर में दो लहरें आपस में, होकर बैचैन। सचमुच बिल्कुल ऐसा था तुम्हारे और मेरे हाथों का वो पहला स्पर्श। -रिज़वान रिज़

नींद By Rizwan Riz.

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हम अक्सर खो देते हैं हर रोज़ हर रात अपने ही वजूद को। हम खो देते हैं सच को। और खो जाते हैं उन झूठे सपनों में.. जिनका नहीं होता ख़ुद का ही वजूद। हम खो देते हैं अक्सर अपने तन-मन और ध्यान को हर बार सोने के बाद। इसमें कुछ भी झूठ नहीं है सचमुच अल्पकालिक मौत-सी होती है नींद। -रिज़वान रिज़

कुछ ख़्वाबों के लिए By Rizwan Riz

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कुछ ख़्वाबों के लिए सपने तो नहीं तोड़ सकता अजनबी आज मिले हैं काल फिर मिलेंगे इनके लिए अपने तो नहीं छोड़ सकता। तुम रहते हो संगेमरमर के अलिसां मकानों में, तो रहो मैं इनके लिए घर तो नहीं छोड़ सकता। आज ये आसमाँ भी शिकारी-सा लगता है हर तरफ जाल बिखरे हैं मगर मैं मस्त परिंदा हूँ अपनी उड़ान तो नहीं छोड़ सकता। वो अँधेरों से डराते हैं मुझे जिन्हें सिर्फ़ उजाले अच्छे लगते हैं मगर मैं जलता दीपक हूँ अपनी तली तो नहीं छोड़ सकता। कल किसी ने ये कहा था 'रिज़वाँ' तुम अच्छा लिखते हो तब से कुुुछ बेचैन हूँ पर अब लिखना तो नहीं छोड़ सकता। -रिज़वान रिज़

अचानक By Rizwan Riz

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अच्छा लगता है जब अचानक से आती है आवाज़ किसी मासूम के रोने की जो आया हो अभी-अभी इस संसार में। जब अचानक से आता है कोई मिलने बरसों बाद हमसे जो रहता हो साथ हमारे कभी पहले साये की तरह। जब देखते हुए बादलों की तरफ अचानक से शुरू हो जाती है बारिश और देखते ही देखते भीग जाते हैं हम पूरे के पूरे। जब किसी की तलाश में हो आँखें और वो आ जाए अचानक से इनके सामने किसी तरीके से। जब कोई हाथ बढ़ता है अचानक से उस मज़बूर की तरफ मदद को जो बस खोने ही वाला था आस ख़ुदा के वज़ूद की। अचानक से कोई दे देता है साथ हमारा जब सब समझ लेते हैं ग़लत हमको। जब कोई दुआ अचानक से हो जाती है क़ुबूल जो मांगी थी अभी-अभी बस कुछ देर पहले। जब अचानक से हो जाता है प्यार इक नज़र देखकर किसी को। और हो जाते हैं हम किसी और के। कितना अच्छा लगता है जब सबकुछ यूँ अचानक से होता है। -रिज़वान रिज़