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कुछ भी लिख देते हो

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तुम तो कुछ भी लिख देते हो। हर चीज़ को सुंदर लिख देते हो। तुम उसके चेहरे को चाँद ज़ुल्फ़ों को बादल लिख देते हो। तुम उसके लबों को गुलाब आँखों को समंदर लिख देते हो। इश्क़ इतना भी ख़ूबसूरत नहीं जितना तुम लिख देते हो। कोई ताउम्र भी नहीं करता इतना प्यार किसी से ‛रिज़वाँ’ तुम जितना अपनी एक ग़ज़ल में लिख देते हो। — रिज़वान रिज़

तेरी सूरत

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हर  तरफ़  नज़र  आए  तेरी सूरत। क्यूँ देखें हम किसी और की सूरत। ग़मों में उदासी में और मुसीबत में। एक बाइस- ए-राहत है तेरी सूरत। जब भी कभी दिल उदास होता है। उदास होने नहीं  देती है तेरी सूरत। देखा है हमने सूरतों की दुनिया में। सबसे हसीन है जहाँ में तेरी सूरत। वैसे भूल जाते हैं हर इक बात को। बस नहीं भूल  पाते  हैं  तेरी सूरत। देख लेते  हैं उदास हम ज़माने को। नहीं देखी जाती  उदास तेरी सूरत। पूँछे कोई  हमसे आख़िरी ख़्वाईश। तो  देखना  चाहेंगे  हम  तेरी सूरत। गर ताज इतराएगा अपनी सूरत पे। शहरे-आग को दिखाएँगे तेरी सूरत। क्यूँ न नाज़ हो तुझे अपनी सूरत पे। ‛रिज़वाँ’ भी  चाहता  है  तेरी  सूरत। — रिज़वान रिज़ 

दौर-ए-मुश्किल

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सुब्हों-शाम नज़र आता है। हर शख़्स परेशान नज़र आता है। अब ख़बर कोई सुनाता ही नहीं। सब वीरान नज़र आता है। अजीब दौर-ए-मुसीबत है। सिर्फ़ नुकसान नज़र आता है। कितनी भी  कोशिशें कर लो। सब नाकाम नज़र आता है। हम ऐसे दौर-ए-इंसां में हैं जहाँ मुश्किल से कोई इंसान नज़र आता है। — रिज़वान रिज़