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वो शख़्स कभी हमारा था By Rizwan Riz

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एक उम्मीद थी सहारा था। वो शख़्स कभी हमारा था। उसके सिवा कुछ देखा नहीं था। कितना साफ़ दिल हमारा था। उसके चेहरे पे इक उदासी थी। बहुत परेशान दिल हमारा था। उसके दिल में रहना चाहते थे। फ़क़त यही एक घर हमारा था। उसकी ज़ुल्फें संवारा करते थे। ख़ूबसूरत काम हमारा था। उसके चेहरे में एक कशिश थी। और ये आईना हमारा था। उसे आँखों में लेकर चलते थे। वो ख़ूबसूरत ख़्वाब हमारा था। जैसा तुम्हारा ख़्वाब है ‘रिज़वाँ’ एक ऐसा ही सच हमारा था। - रिज़वान रिज़