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Showing posts from July, 2020

महबूब शहर.. दिल्ली By Rizwan Riz

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मैं केवल तुमसे प्यार नहीं करता। तुम्हारे शहर से भी उतनी ही मुहब्बत करता हूँ, जितनी तुमसे। ये बात मुझे आज ही रेलवे-स्टेशन पे पता चली। हालांकि ऐसा सुनना तुम्हें अच्छा न लगे। मगर मुझे आज दिल्ली को छोड़ते हुए ऐसा ही महसूस हो रहा है। मुझे समझ नहीं आता किसका ग़म ज़्यादा है, तुमसे दूर होने का या दिल्ली के छूट जाने का। ख़ैर, ये शहर भी तो तुम्हारा ही है। तुम्हारी बहुत-सी यादें, बहुत-सी बातें हमारा बचपन, और ज़िंदगी का एक शायद सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा छुपा है, इस दिल्ली में। और क्या तुम जानती हो इतनी सारी यादों, कहानियों और अनुभव के बाद  मेरा दिल भी दिल्ली जैसा हो चुका है। तुम चाहो तो इसमें आकर रह सकती हो ये भी तो आख़िर तुम्हारा ही घर है। - रिज़वान रिज़

शिकायत है By Rizwan Riz

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राम को रहीम से और रहीम को राम से शिकायत है। होनी भी चाहिए क्योंकि ये दोनों बरसों-बरस के साथी रहे हैं। ऐसे साथी जिनको एक-दूसरे से अलग कर पाना मुश्क़िल है। उतना ही मुश्क़िल, जितना ख़ुद को ख़ुद से अलग करना। मगर आज राम ने रहीम को, रहीम न कहकर मुसलमान कह दिया और रहीम भी उसको हिंदू कहते हुए दूसरी तरफ जाकर बैठ गया है। अब दोनों इस बात को सोच रहे हैं कि हम दोनों को आख़िर हिंदु-मुसलमान किसने बना दिया, हम तो बरसों से केवल राम और रहीम थे। - रिज़वान रिज़