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Showing posts from December, 2021

इतना भी क्या सोच रहे हो? By Rizwan Riz

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इतना भी क्या सोच रहे हो? क्या तुम भी वो ही सोच रहे हो? मैं तो तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? रूठो मत, मैं भी मान गया हूँ। बैचैनी पहचान गया हूँ। चलो, चलो मन हल्का करलो। मुझको अपनी बाहों में भर लो। अब नीचे तुम क्या देख रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। छोड़ो, चलो अब शर्माना। उल्टे-सीधे चेहरे बनाना। मुझको सब मालूम है। तुम क्या-क्या सोच रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। इतनी बड़ी कोई बात नहीं है। चुप रहने की बात नहीं है। कब से लब ख़ामोश हैं तुम्हारे बस आँखों से ही बोल रहे हो। मैं भी तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? -रिज़वान रिज़

दिन गुज़र रहे थे By Rizwan Riz

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रातें बीत रहीं थीं दिन गुज़र रहे थे किसी की जुदाई में हम धीरे-धीरे मर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. चाहते थे कुछ कहना कुछ बताना उनको अपने बारे में वो किसी और का ज़िक्र कर रहे थे, हँसकर.. हम सब्र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. सब मशरूफ थे अपने-अपने कामों में कोई सँवरता था किसी के लिए कोई मचलता था किसी के लिए कोई तड़पता था किसी के लिए तो कोई लिखता था किसी के लिए पूरी दुनिया चल रही थी हम यूँ ही गुज़र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. हर शख़्स ख़ूबसूरत चारों तरफ मुहब्बत तन्हाई में इक हम कितनी हसीन दुनिया में पल-पल बिखर रहे थे। रातें बीत रहीं थीं और दिन गुज़र रहे थे.. -रिज़वान रिज़