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तुम लौट आओगे

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उम्र के किसी भी दौर में, ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर। उम्मीदों का ये सिला मिलेगा यक़ीनन एक पल ऐसा मिलेगा। हर एक सदा तुमको मेरी लगेगी। हर शख़्स में मेरी सूरत दिखेगी। कहीं भी तुम्हारा दिल न लगेगा। कोई भी तुमको अपना न लगेगा। मेरी वफ़ा याद आएगी तुमको। थोड़ा-बहुत फिर रुलायेगी तुमको। यक़ीन ये तुमको भी होने लगेगा। दिल ये तुम्हारा फिर कहने लगेगा। चलो वापसी का वक़्त हो गया है। वापस मुझे मेरा घर मिल गया है। तुम हाथों से मलते हुए अपने आँसू मन ही मन बेहद मुस्कुराओगे। झूठी कोशिशों से रोकोगे ख़ुदको मगर कदमों को रोक नहीं पाओगे। मुझे यक़ीन है एक दिन.. तुम लौट आओगे। —  रिज़वान रिज़

उनके लिए

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सुनों! कभी भी इस ग़लतफ़हमी में मत रहना कि किसी भी मायने में कम हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. हर शय से हसीं हर मय से नशीं। हर सुब्ह से शादाब किसी रात का मेहताब। लिए चेहरा उदास सारी बातों से ख़ास। जैसे सादगी की एक मूरत हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. गुलों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत हो तुम। — रिज़वान रिज़

दौर-ए-मुश्किल

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सुब्हों-शाम नज़र आता है। हर शख़्स परेशान नज़र आता है। अब ख़बर कोई सुनाता ही नहीं। सब वीरान नज़र आता है। अजीब दौर-ए-मुसीबत है। सिर्फ़ नुकसान नज़र आता है। कितनी भी  कोशिशें कर लो। सब नाकाम नज़र आता है। हम ऐसे दौर-ए-इंसां में हैं जहाँ मुश्किल से कोई इंसान नज़र आता है। — रिज़वान रिज़