तेरी सूरत
क्यूँ देखें हम किसी और की सूरत।
ग़मों में उदासी में और मुसीबत में।
एक बाइस- ए-राहत है तेरी सूरत।
जब भी कभी दिल उदास होता है।
उदास होने नहीं देती है तेरी सूरत।
देखा है हमने सूरतों की दुनिया में।
सबसे हसीन है जहाँ में तेरी सूरत।
वैसे भूल जाते हैं हर इक बात को।
बस नहीं भूल पाते हैं तेरी सूरत।
देख लेते हैं उदास हम ज़माने को।
नहीं देखी जाती उदास तेरी सूरत।
पूँछे कोई हमसे आख़िरी ख़्वाईश।
तो देखना चाहेंगे हम तेरी सूरत।
गर ताज इतराएगा अपनी सूरत पे।
शहरे-आग को दिखाएँगे तेरी सूरत।
क्यूँ न नाज़ हो तुझे अपनी सूरत पे।
‛रिज़वाँ’ भी चाहता है तेरी सूरत।
— रिज़वान रिज़
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Thankyou...
-Rizwan Riz