बीस दिन
बीस दिन बाक़ी हैं शायद इस ज़िंदगी के लिए।
बीस दिन से लफ्ज़ भी मेरे कुछ ख़ामोश हैं
बीस दिन से मानों जैसे हम भी कुछ मदहोश हैं।
बीस दिन से दिल को कुछ न अच्छा लगता है
बीस दिन से कोई भी शख़्स न सच्चा लगता है।
बीस दिन से आँखों में कुछ नमी-नमी-सी रहती है
सब है मेरे पास में फिर भी कमी-कमी-सी रहती है।
बीस दिन से हाल है ऐसा न हँसते है न रोते हैं
बीस दिन से पता नहीं कब जगते हैं कब सोते हैं।
बीस दिन से चाँद भी ख़ुद से नाराज़-सा लगता है
देर से निकलता है बड़ी जल्दी-जल्दी छिपता है।
बीस दिन पहले छोड़ गया था वो मुझको तन्हाई में
बीस दिन से ढूँढ रहा हूँ उसको ख़ुद की परछाई में।
बीस दिन तो बहाना है हम अरसों से उनसे दूर हैं
कैसे कहें, क्या बतलायें कितने हम मज़बूर हैं।
बीस दिन की ये जुदाई बीस बरस-सी लगती है
दिन बेचारा तड़पता है बेबस नज़रें तरसती हैं।
बीस दिन से राहों में इक सूनापन-सा रहता है
बस ठहरो अब ठहरो 'रिज़वाँ' रस्ता मुझसे कहता है।
— रिज़वान रिज़

Comments
Post a Comment
Thankyou...
-Rizwan Riz