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Showing posts from April, 2020

सच क्या है ? By Rizwan Riz

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सच क्या है ? कभी सोचा है। कभी-कभी जो दिखता है वो सच नहीं होता है। और सच छुप जाता है किसी अँधेरे के पीछे। मैंने कई ऐसे लम्हों का अनुभव किया है जब सच बहुत परे था मेरे वाले सच से। और अफ़सोस कि सच भी सदा रहता नहीं एक सभी के लिए ये बदलता है काल-देश और इंसान-दर-इंसान। जब हम नहीं बैठा पाते हैं सामंजस्य एक सच के साथ तो बना लेते हैं एक और नया सच। मैं सोचता हूँ कई बार कि सचमुच ये सच क्या है ? पर अक्सर सच बताने वाले ही होते हैं सच से कोसों दूर और करते हैं झूठी बातें किंतु वो सच है उनके लिए। सचमुच, सच तो कुछ भी नहीं ये तो है बस समय और परिस्थितियों का सामंजस्य। -रिज़वान रिज़

यक़ीनन हमें तुमसे नफ़रत नहीं है By Rizwan Riz

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यक़ीनन  हमें  तुमसे  नफ़रत नहीं हैं। मगर दिल को तुमसे मुहब्बत नहीं है। हमें  इश्क़  है  बस  हमारे  सनम  से। किसी  और की अब ज़रूरत नहीं है। बैठे  हैं  कब से  हम राहों में  जिनकी। उन्हें हमसे मिलने की मोहलत नहीं है। अमीरों की बस्ती चमकती गलियों में। ग़रीबों को आने की  इजाज़त नहीं है। माना  कि  कांधों पर  बोझ  बहुत  है। मुझे  सिर  झुकाने  की आदत नहीं है। झूठ  को  बेचके , सच  खरीदने वाले। बेईमानों  के  घरों  में  बरकत  नहीं है। तेरे जिस्म से हम बेबसी  में  हैं लिपटे। ये  सच्ची  मुहब्बत है  वहशत  नहीं है। मरते  रहे   हैं   जो  हरदम  वतन  पर। उन्हीं  के  दामन  में  शोहरत  नहीं  है। तू  है  बादशाह फ़क़त  इक  महल का। तू...

रुक जाना मत By Rizwan Riz

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राहें बहुत कठिन मिलेंगी देख उन्हें घबराना मत। मंज़िल को पाने से पहले देखो तुम रुक जाना मत। अपना सपना ज़िंदा रखना सपने से ध्यान हटाना मत। वक़्त का कोई विकल्प नहीं इसको व्यर्थ गँवाना मत। पहले तुम मेहनत कर लेना किस्मत को अजमाना मत। जीवन में दुःख के पर्वत होंगे अपना शीश झुकाना मत। नदियाँ बहतीं झूठ की यहाँ इनमें डूब के जाना मत। दुनिया तुमपे हँसेगी पक्का इसकी हँसी से शर्माना मत। बहुत मिलेंगे भटकाने वाले उनकी बातों में आना मत। तुमसे तुम्हारा ध्यान हटाएँ ऐसे लोगों में जाना मत। अपने मन की भी सुन लेना औरों की राय में आना मत। तुम सबकुछ कर सकते हो। किसी से आस लगाना मत। जब तुम मंज़िल को पा लो रस्तों को भूल जाना मत। मेरी कविता एक सबक़ है इसको भूल जाना मत। © रिज़वान रिज़

मुझे इस हाल में होने दो न By Rizwan Riz

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मुझे इस हाल में होने दो न। जी  भर के  तुम रोने दो न। यूँ आराम मिले दो पल का। अपनी बाहों में  सोने दो न। बिखर रही साँसें, मोती-सी। इनकी इक माला पोने दो न। जिससे कोई  प्रेम उग  सके। वो बीज मुझे तुम बोने दो न। तनहा होने  में डर लगता है। भीड़ में मुझको  खोने दो न। तुम अब बस मेरी हो जाओ। मुझको अपना  होने  दो  न। आओ पहले मिलन करें हम। जो होता है, अब होने दो न। - रिज़वान रिज़ **ख़ुद के हाथों पे यक़ीन करो।     सोई तकदीर को सोने दो न।