न चाहकर भी एक उदासी में रहता हूं। मैं इन दिनों बड़ी मुसीबत में रहता हूं। पूरी दुनियां नफ़रतों में मुब्तला है। हर तरफ़ बर्बादियों का सिलसिला है। लोग बड़ी आसानी से लोगों को मार देते हैं। घरों, दुकानों, इबादतगाहों और गुलिस्तानों को उजाड़ देते हैं। हर सिम्त बस नफ़रत नज़र आती है। फिर तेरी सूरत भी याद आती है। — रिज़वान रिज़
सुनों! कभी भी इस ग़लतफ़हमी में मत रहना कि किसी भी मायने में कम हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. हर शय से हसीं हर मय से नशीं। हर सुब्ह से शादाब किसी रात का मेहताब। लिए चेहरा उदास सारी बातों से ख़ास। जैसे सादगी की एक मूरत हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. गुलों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत हो तुम। — रिज़वान रिज़
तुम तो कुछ भी लिख देते हो। हर चीज़ को सुंदर लिख देते हो। तुम उसके चेहरे को चाँद ज़ुल्फ़ों को बादल लिख देते हो। तुम उसके लबों को गुलाब आँखों को समंदर लिख देते हो। इश्क़ इतना भी ख़ूबसूरत नहीं जितना तुम लिख देते हो। कोई ताउम्र भी नहीं करता इतना प्यार किसी से ‛रिज़वाँ’ तुम जितना अपनी एक ग़ज़ल में लिख देते हो। — रिज़वान रिज़
Comments
Post a Comment
Thankyou...
-Rizwan Riz