न चाहकर भी एक उदासी में रहता हूं। मैं इन दिनों बड़ी मुसीबत में रहता हूं। पूरी दुनियां नफ़रतों में मुब्तला है। हर तरफ़ बर्बादियों का सिलसिला है। लोग बड़ी आसानी से लोगों को मार देते हैं। घरों, दुकानों, इबादतगाहों और गुलिस्तानों को उजाड़ देते हैं। हर सिम्त बस नफ़रत नज़र आती है। फिर तेरी सूरत भी याद आती है। — रिज़वान रिज़
तुम तो कुछ भी लिख देते हो। हर चीज़ को सुंदर लिख देते हो। तुम उसके चेहरे को चाँद ज़ुल्फ़ों को बादल लिख देते हो। तुम उसके लबों को गुलाब आँखों को समंदर लिख देते हो। इश्क़ इतना भी ख़ूबसूरत नहीं जितना तुम लिख देते हो। कोई ताउम्र भी नहीं करता इतना प्यार किसी से ‛रिज़वाँ’ तुम जितना अपनी एक ग़ज़ल में लिख देते हो। — रिज़वान रिज़
हर तरफ़ नज़र आए तेरी सूरत। क्यूँ देखें हम किसी और की सूरत। ग़मों में उदासी में और मुसीबत में। एक बाइस- ए-राहत है तेरी सूरत। जब भी कभी दिल उदास होता है। उदास होने नहीं देती है तेरी सूरत। देखा है हमने सूरतों की दुनिया में। सबसे हसीन है जहाँ में तेरी सूरत। वैसे भूल जाते हैं हर इक बात को। बस नहीं भूल पाते हैं तेरी सूरत। देख लेते हैं उदास हम ज़माने को। नहीं देखी जाती उदास तेरी सूरत। पूँछे कोई हमसे आख़िरी ख़्वाईश। तो देखना चाहेंगे हम तेरी सूरत। गर ताज इतराएगा अपनी सूरत पे। शहरे-आग को दिखाएँगे तेरी सूरत। क्यूँ न नाज़ हो तुझे अपनी सूरत पे। ‛रिज़वाँ’ भी चाहता है तेरी सूरत। — रिज़वान रिज़
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Thankyou...
-Rizwan Riz