वक़्त सापेक्ष है

हर दिन
चौबीस घंटे का नहीं होता।
हर साल में नहीं होते
तीन सौ पैंसठ दिन।
हर घंटा नहीं होता है
साठ मिनट का।
और हर मिनट में नहीं होते
साठ सेकेंड।

मैं कई बार महसूस किया है।
कभी-कभी गुज़र जाते हैं कई साल
महज़ कुछ दिनों में और
कभी-कभी एक दिन भी
सालों जैसा लगता है।

कभी-कभी महीने निकल
जाते हैं कुछ दिनों में
और लौट कर आता है
दूसरा इतवार कई हफ्तों में।

और फिर वक़्त भी सबके साथ
एक-सी चाल से नहीं चलता,
शायद इसीलिए वक़्त निरपेक्ष नहीं,
सापेक्ष है।

— रिज़वान रिज़ 

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