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Showing posts from April, 2019

वो प्यारे दिन By Rizwan Riz

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कितने प्यारे थे वो दिन जब साथ-साथ हम रहते थे होली और दीवाली के रंगों में साथ-साथ हम घुलते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. दुःख की तो औकात नहीं थी मायूस हमें जो कर जाए मन होता तो रो लेते थे पर बेमन भी हम हँसते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. मालूम न होता कब रूठ जाएँगे पल-पल ही हम लड़ते थे पर दोस्ती के पाक रिश्ते को दिल में जिंदा रखते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. कुछ यार हमारे ऐसे भी थे जो हम पे जान छिड़कते थे कुछ तो मानों खरबूज़े थे वो पल-पल रंग बदलते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. सोचा न था यूँ खो जाएँगे संसार-नुमा इस मेले में माना कि अनजान थे हम-तुम पर अपने-अपने लगते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. सब यादें धुँधली हो जाती हैं सब मिलते ओर बिछड़ते हैं दिल में होते तो शायद भूल भी जाता तुम तो साँसों में बसते थे। कितने प्यारे थे वो दिन जब.. दिल चाहता है फिर मिल जाएँ जो यार हमारे अपने थे आज वो सपनों में दिखते हैं जो साथ हम...

प्राचिता के नाम By Rizwan Riz

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मैं  कब से  इक  नाकाम कोशिश कर रहा हूँ। प्राचिता तुम्हें लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। बेशक़ ज़िंदगी किसी सफ़र से कम नहीं। इस सफ़र में बहुत से लोग मिलते हैं और समय के साथ दूर हो जाते हैं। मगर इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं हैं कि वो हमसे बिछड़ गये हैं । सच तो ये है कि वो हमारी नज़रों से दूर होकर दिल मे घर कर जाते हैं और ख़ुद को हमेशा के लिए अमर कर जाते हैं। आज इस कविता के ज़रिए हम, हमारे भूगोल विभाग (डॉ° भीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) की एक उम्दा भूगोलवेत्ता और समाजसेविका स्वर्गीय प्राचिता जी को याद कर रहे हैं। और साथ ही सभी पाठकों से उम्मीद कर रहे हैं कि आप सब भी ज़रूर उनके स्वर्गीय समय की कामना करेंगे। तो पेश है रिज़वान रिज़ के द्वारा लिखित एक कविता प्राचिता के नाम.. ********* इस तरह जाना जरूरी था क्या हमको यूँ रुलाना ज़रूरी था क्या यूँ रूठ जाना जरूरी था क्या क्यूँ तुम चुप हो इतना आज ये चुप्पी मिटाओ न प्रचिता। तुम आजाओ न प्राचिता। तुम आजाओ न प्रचिता। बेहतर थी तुम हम सबसे तुम आज भी बेहतर हो हम सबसे.. तुम अपने फ़न में माहिर थी तुम भाषओं की...

इक-इक करके बाँटा था जो By Rizwan Riz

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इक-इक करके बाँटा था जो, हर पल जैसे बर्बाद हुआ भीड़ में कितने तनहा थे हम, आज हमें अहसास हुआ। लरज़ रही थीं दीवारें जब, अनजान बने हम बैठे थे पूरा घर ही बिखर गया तब, हमको ये एहसास हुआ। मीठी बातें वो भोलापन, तुम सचमुच कितने अच्छे थे तुमसे झगड़के बैठ गए तब, हमको ये अहसास हुआ। रोये-धोये, चिल्लाये हम, पूरा घर भी देख लिया इक छोटी-सी आहट में, हमको तेरा एहसास हुआ। झूठी कसमें झूठे चेहरे आख़िर, कितने चलने वाले थे ख़ुद आईने ने बतलाया तब, हमको ये अहसास हुआ। मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर, सारे  जाकर देख लिए आख़िर दिल में झाँका तो, अल्लाह तेरा एहसास हुआ। पूरी ज़िंदगी यूँही गुज़री, सामान-ए-आख़रत कुछ भी नहीं कब्र में जाकर लेटे 'रिज़वाँ', तब हमको ये एहसास हुआ। -रिज़वान रिज़

आप जो ख़्वाबों में आए न होते

आप जो ख़्वाबों में आए न होते बेवज़ह हम मुस्कुराए न होते। न फूल खिलते न कलियाँ मुस्कुरातीं भँभरे यूँ गुनगुनाए न होते। आप जो ख़्वाबों में आए न होते.. मौसम भी कुछ, ख़ास न होता सावन का एहसास न होता। पतझड़ दिखता, चारों ओर बस बसंत, बहार भी आए न होते। आप जो ख़्वाबों में आए न होते.. तुम बिन दिन भी, मुश्क़िल रहते दूबर होता, रातों का कटना अकेले पड़े हुए, बिस्तर पर होता केवल, तारों को गिनना। तुम आए तो, अपनापन आया हम वरना बहुत, पराए होते। आप जो ख़्वाबों में आए न होते.. दिल भी कुछ, धीरे धड़कता साँसें भी कुछ, मद्धम होतीं हम भी रहते बुझे-बुझे-से जीवन में बस, बेचैनी होती। तुम हो तो, अच्छा ही है, वरना हम, कितनों के ठुकराए होते। आप जो ख़्वाबों में आए न होते.. मुश्क़िल होता, कविताओं को लिखना झूठी-सच्ची, तारीफें करना ख़ूबसूरत शब्दों को चुनना एक अनूठी कल्पना को गढ़ना। ये सब इतना आसान न होता गर तुम इसमें समाय न होते। आप जो ख़्वाबों में आए न होते.. बेवज़ह हम मुस्कुराए न होते। — रिज़वा...

इन आँखों से आँसू भी बहाया करो

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इन आँखों से आँसू भी बहाया करो दर्द क्या होता है समझ जाया करो। मैं अब बस तुम्हारी चाहत में बँधा हूँ मेरे सामने तुम ज़रा खुल जाया करो। मैं तुम्हें बहुत अंदर से जान चुका हूँ मुझे तुम अब कुछ मत बताया करो। ये दिन दिनभर उसकी याद दिलाते हैं ऐं रातों अब तुम तो मत सताया करो। हम तुम्हारे चेहरे के क़ायल नहीं होंगे झूठ बोलते हुए थोड़ा शरमाया करो। जो नहीं समझते हैं ख़ामोशी ज़रा भी ऐसे लोगो से दिल, मत लगाया करो। दुनिया का क्या है ये ग़म ही देती है ग़मों को भूलके तुम मुस्कुराया करो। मुहब्बत फिर मुहब्बत-सी नहीं लगती किसी को ज्यादा गले मत लगाया करो। तुम्हारे ज़ख्म भी ख़ुद ही भरने लगेंगे किसी के ज़ख्म पे मरहम लगाया करो। कौन आता है अब मिलने तुम्हें 'रिज़वाँ' किसी के लिए रस्ते मत सजाया करो। — रिज़वान रिज़

मौत

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आज तुम बहुत याद आ रही हो ऐं मौत! इतना क्यूँ सता रही हो। क्या तुम भी परेशां हो किसी ग़म से आख़िर तुम क्यूँ ज़िद दिखा रही हो। सोचते हैं क्या पाया, ये ज़िंदगी जीकर ज़ख्मों को लेकर, ग़मों को पी-पीकर। काश! तुम पहले मिलतीं तो, ये हाल न होता बेबस-सी ज़िंदगी का मलाल न होता। ख़ैर, अब आ ही गई हो तो, इतना न शर्माओ मुझको ज़रा छुओ, गले से लगाओ। अरे! दूर क्यूँ जा रही हो.. ऐं मौत! इतना क्यूँ सता रही हो। कुछ देर ठहरो, ज़रा ज़िंदगी से मिल लूँ इस बेवफ़ा से दो बातें तो कर लूँ। मुझको छोड़ देने का बहाना तो पता चले तुम ज़रा छुप जाओ, इसको पता न चले। क्यूँ करीब आ रही हो.. ऐं मौत! इतना क्यूँ सता रही हो। ज़िंदगी तेरी याद में हम आँसू बहाएंगे। चाहके भी अब कभी न, तुमसे मिल पाएंगे। जब हम तुम्हारे साथ थे, तुम बहुत मगरूर थीं आख़िर तुम ज़िंदगी थीं, बेवफ़ाई को मज़बूर थीं। अब हमारे बिछड़ने की घड़ी आ चुकी है उधर देखो मौत खड़ी है..वो आ चुकी है। ज़िंदगी बेवफा सही मगर तुमसे ज्यादा प्यारी है। इसका भी इक दौर था पर अब तुम्हारी बारी है। अब मैं तुम्हारे इश्क़ में बीमार हो चुका हूँ साथ तुम्हारे चलने को तैयार हो चुका हूँ। अब क्यूँ देर लगा रही हो.. ऐं ...

बारिश

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जब कभी बारिश आती है वो दीवार टूट जाती है अक्सर माँ जिसे बारिश के बाद बनाती है। कोई बरतन रख देता है जहाँ पानी टप-टप-टप गिरता है कोई चारपाई उठाता है जो बिछी हुई थी आँगन में और किसी के द्वारा उठा लिए जाते हैं वो कपड़े, जो सूख रहे हल्की-हल्की धूप में। सचमुच ये बारिश हमें तंग-सा कर जाती है गुस्सा तो जायज़ है फिर भी इक हँसी-सी आ जाती है सबके चेहरों पर मगर ये बारिश बहुत ही प्यारी है जो मेरा घर जोड़ जाती है। — रिज़वान रिज़

खुलकर हँसना मुश्किल है

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खुलकर हँसना मुश्किल है दिल भी किसी का दुखता है हम तो हँसते रहते हैं पर ग़म किसी का जी उठता है कहते-कहते कभी जब हम अचानक से चुप जाते हैं चलते-चलते राहों में जब सोचके कुछ रुक जाते हैं मानों हम कुछ भूल रहे हों बेचैनी में झूल रहे हों कुछ तनहा-तनहा लगता हैं दिल भी किसी का दुखता है चलते-चलते राहों में जब घड़ी शाम की आती है शोर-शराबा आवाज़ें सारी इक दम से रुक जाती हैं रोते-रोते एक मासूम-सा बच्चा भी चुप जाता है टंगा दिनभर आसमान में सूरज भी थक जाता है पंछी चुनकर दाना वापस घोंसले में आता है मानों जैसे संसार ही सारा इक दम से रुक जाता है सब धुंधला-धुंधला लगता है तब दिल में एक आहट होती है कुछ धीरे-धीरे चुभता है दिल भी किसी का दुखता है चाँद अकेला में अकेला दोनों में कुछ समता है वो मुझे ताके में उसे ताकूँ रातभर ये चलता है शायद मैं फिर सो जाता हूँ यादों में खो जाता हूँ पर चाँद अकेल...