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वक़्त सापेक्ष है

हर दिन चौबीस घंटे का नहीं होता। हर साल में नहीं होते तीन सौ पैंसठ दिन। हर घंटा नहीं होता है साठ मिनट का। और हर मिनट में नहीं होते साठ सेकेंड। मैं कई बार महसूस किया है। कभी-कभी गुज़र जाते हैं कई साल महज़ कुछ दिनों में और कभी-कभी एक दिन भी सालों जैसा लगता है। कभी-कभी महीने निकल जाते हैं कुछ दिनों में और लौट कर आता है दूसरा इतवार कई हफ्तों में। और फिर वक़्त भी सबके साथ एक-सी चाल से नहीं चलता, शायद इसीलिए वक़्त निरपेक्ष नहीं, सापेक्ष है। — रिज़वान रिज़ 

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए, कोई कविता लिखे। कोई गीत सुने, कोई ख़्वाब बुने। बहुत दिन हुए। हर कविता, गीत और ख़्वाब। एक नई ज़िंदगी है। बहुत दिन हुए, जिंदगी जिए। — रिज़वान रिज़

गुलिस्तान

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  न चाहकर भी एक उदासी में रहता हूं। मैं इन दिनों बड़ी मुसीबत में रहता हूं। पूरी दुनियां नफ़रतों में मुब्तला है। हर तरफ़ बर्बादियों का सिलसिला है। लोग बड़ी आसानी से लोगों को मार देते हैं। घरों, दुकानों, इबादतगाहों और गुलिस्तानों को उजाड़ देते हैं। हर सिम्त बस नफ़रत नज़र आती है। फिर तेरी सूरत भी याद आती है। — रिज़वान रिज़

कुछ भी लिख देते हो

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तुम तो कुछ भी लिख देते हो। हर चीज़ को सुंदर लिख देते हो। तुम उसके चेहरे को चाँद ज़ुल्फ़ों को बादल लिख देते हो। तुम उसके लबों को गुलाब आँखों को समंदर लिख देते हो। इश्क़ इतना भी ख़ूबसूरत नहीं जितना तुम लिख देते हो। कोई ताउम्र भी नहीं करता इतना प्यार किसी से ‛रिज़वाँ’ तुम जितना अपनी एक ग़ज़ल में लिख देते हो। — रिज़वान रिज़

तेरी सूरत

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हर  तरफ़  नज़र  आए  तेरी सूरत। क्यूँ देखें हम किसी और की सूरत। ग़मों में उदासी में और मुसीबत में। एक बाइस- ए-राहत है तेरी सूरत। जब भी कभी दिल उदास होता है। उदास होने नहीं  देती है तेरी सूरत। देखा है हमने सूरतों की दुनिया में। सबसे हसीन है जहाँ में तेरी सूरत। वैसे भूल जाते हैं हर इक बात को। बस नहीं भूल  पाते  हैं  तेरी सूरत। देख लेते  हैं उदास हम ज़माने को। नहीं देखी जाती  उदास तेरी सूरत। पूँछे कोई  हमसे आख़िरी ख़्वाईश। तो  देखना  चाहेंगे  हम  तेरी सूरत। गर ताज इतराएगा अपनी सूरत पे। शहरे-आग को दिखाएँगे तेरी सूरत। क्यूँ न नाज़ हो तुझे अपनी सूरत पे। ‛रिज़वाँ’ भी  चाहता  है  तेरी  सूरत। — रिज़वान रिज़ 

तुम लौट आओगे

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उम्र के किसी भी दौर में, ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर। उम्मीदों का ये सिला मिलेगा यक़ीनन एक पल ऐसा मिलेगा। हर एक सदा तुमको मेरी लगेगी। हर शख़्स में मेरी सूरत दिखेगी। कहीं भी तुम्हारा दिल न लगेगा। कोई भी तुमको अपना न लगेगा। मेरी वफ़ा याद आएगी तुमको। थोड़ा-बहुत फिर रुलायेगी तुमको। यक़ीन ये तुमको भी होने लगेगा। दिल ये तुम्हारा फिर कहने लगेगा। चलो वापसी का वक़्त हो गया है। वापस मुझे मेरा घर मिल गया है। तुम हाथों से मलते हुए अपने आँसू मन ही मन बेहद मुस्कुराओगे। झूठी कोशिशों से रोकोगे ख़ुदको मगर कदमों को रोक नहीं पाओगे। मुझे यक़ीन है एक दिन.. तुम लौट आओगे। —  रिज़वान रिज़

उनके लिए

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सुनों! कभी भी इस ग़लतफ़हमी में मत रहना कि किसी भी मायने में कम हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. हर शय से हसीं हर मय से नशीं। हर सुब्ह से शादाब किसी रात का मेहताब। लिए चेहरा उदास सारी बातों से ख़ास। जैसे सादगी की एक मूरत हो तुम। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ.. गुलों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत हो तुम। — रिज़वान रिज़

दौर-ए-मुश्किल

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सुब्हों-शाम नज़र आता है। हर शख़्स परेशान नज़र आता है। अब ख़बर कोई सुनाता ही नहीं। सब वीरान नज़र आता है। अजीब दौर-ए-मुसीबत है। सिर्फ़ नुकसान नज़र आता है। कितनी भी  कोशिशें कर लो। सब नाकाम नज़र आता है। हम ऐसे दौर-ए-इंसां में हैं जहाँ मुश्किल से कोई इंसान नज़र आता है। — रिज़वान रिज़

चला जाने वाला शख़्स By Rizwan Riz

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चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। इस दुनिया से चले जाने के बाद। उसके बोलने-सुनने रहने-सहने, कुछ कहने चलने-फिरने, खाने-पीने ज़िंदगी जीने और कभी-कभी तो मरने का अंदाज़ हर एक जीवित शख़्स को इतना पसंद आता है इतना पसंद आता है कि मानों वो शख़्स नहीं कोई अवतार या कोई चमत्कार हो। हर घर-गली-मुहल्ले में होती हैं चर्चाएँ उसकी हर सामान्य-सी बात को उसका अनूठा गुण बताते हुए। लोग थकते भी नहीं हैं उसके क़िस्से सुनाते हुए। इसलिए अक्सर ऐसा लगता है। चला जाने वाला शख़्स कितना अच्छा होता है। - रिजवान रिज़

तुमको भी ऐसा लगता है क्या? By Rizwan Riz

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कभी-कभी तन्हाई में शोर-शराबा लगता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? रोज सड़क पर चलते-चलते रस्ता भी साथ चलता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? आँखें बंद कर लेने पर भी कोई चेहरा दिखता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? जिसको चाहो वो ही नींदों में सपना बनकर दिखता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? वो जिसकी तुमको परवाह है तुम पर जान छिड़कता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? महज़ तुम्हें हँसाने की ख़ातिर नकली हँसी कोई हँसता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? इंतेजार किसी का ज्यादा हो जब कोई देर हमेशा करता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? इक बात बताओ मुझको तुम मैं तो तुमको चाहता ही हूँ। तुमको भी ऐसा लगता है क्या? इक शख़्स जो चुप बैठा है पीछे। 'रिज़वाँ’ जैसा लगता है क्या? तुमको भी ऐसा लगता है क्या? -रिज़वान रिज़

काश! तुम हमारे होते By Rizwan Riz

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काश! तुम हमारे होते। हम पूरे हो जाते। मुक़म्मल हो जाते कई सफर। कई  ख़्वाब पूरे हो जाते। काश! तुम हमारे होते। हमें फिर कोई आस न होती किसी और की तलाश न होती। किसी से मिलन की चाह न रहती आँखों में कोई भी राह न रहती। ख़ुद हम भी बस तुम्हारे होते। काश! तुम हमारे होते। और हम इतने उदास न होते। तन्हाई के साथ न रहते। वक़्त भी कितना प्यारा होता हम भी तुम्हारी बाहों में सोते। काश! तुम हमारे होते। - रिज़वान रिज़

इतना भी क्या सोच रहे हो? By Rizwan Riz

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इतना भी क्या सोच रहे हो? क्या तुम भी वो ही सोच रहे हो? मैं तो तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? रूठो मत, मैं भी मान गया हूँ। बैचैनी पहचान गया हूँ। चलो, चलो मन हल्का करलो। मुझको अपनी बाहों में भर लो। अब नीचे तुम क्या देख रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। छोड़ो, चलो अब शर्माना। उल्टे-सीधे चेहरे बनाना। मुझको सब मालूम है। तुम क्या-क्या सोच रहे हो। मैं भी वोही सोच रहा हूँ। जैसा तुम सोच रहे हो। इतनी बड़ी कोई बात नहीं है। चुप रहने की बात नहीं है। कब से लब ख़ामोश हैं तुम्हारे बस आँखों से ही बोल रहे हो। मैं भी तुमको सोच रहा हूँ। क्या तुम भी मुझको सोच रहे हो? -रिज़वान रिज़

दिन गुज़र रहे थे By Rizwan Riz

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रातें बीत रहीं थीं दिन गुज़र रहे थे किसी की जुदाई में हम धीरे-धीरे मर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. चाहते थे कुछ कहना कुछ बताना उनको अपने बारे में वो किसी और का ज़िक्र कर रहे थे, हँसकर.. हम सब्र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. सब मशरूफ थे अपने-अपने कामों में कोई सँवरता था किसी के लिए कोई मचलता था किसी के लिए कोई तड़पता था किसी के लिए तो कोई लिखता था किसी के लिए पूरी दुनिया चल रही थी हम यूँ ही गुज़र कर रहे थे। दिन गुज़र रहे थे.. हर शख़्स ख़ूबसूरत चारों तरफ मुहब्बत तन्हाई में इक हम कितनी हसीन दुनिया में पल-पल बिखर रहे थे। रातें बीत रहीं थीं और दिन गुज़र रहे थे.. -रिज़वान रिज़

वो शख़्स कभी हमारा था By Rizwan Riz

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एक उम्मीद थी सहारा था। वो शख़्स कभी हमारा था। उसके सिवा कुछ देखा नहीं था। कितना साफ़ दिल हमारा था। उसके चेहरे पे इक उदासी थी। बहुत परेशान दिल हमारा था। उसके दिल में रहना चाहते थे। फ़क़त यही एक घर हमारा था। उसकी ज़ुल्फें संवारा करते थे। ख़ूबसूरत काम हमारा था। उसके चेहरे में एक कशिश थी। और ये आईना हमारा था। उसे आँखों में लेकर चलते थे। वो ख़ूबसूरत ख़्वाब हमारा था। जैसा तुम्हारा ख़्वाब है ‘रिज़वाँ’ एक ऐसा ही सच हमारा था। - रिज़वान रिज़

रिज़ By Rizwan Riz

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तुम्हें पता भी न चलेगा। और टूट जाएगा वो। एक तारा। जिसे तुम रिज़ कहती थीं। फिर कोई नया तारा होगा। तुम्हारे साथ। इस आकाश-रूपी  जीवन में। -रिज़वान रिज़

नई उम्मीदें By Rizwan Riz

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हर सुबह लेकर आती है नई उम्मीदें नई खुशियाँ। नए सपने नए कसमें। नए वादे नए इरादे। नए धोखे नए मौके। नए चेहरे नए पहरे। नए काम नए दाम। नई ख्वाइशें नई कोशिशें  नई सफलताएँ नए मायूसियाँ। नई मुलाक़ातें नए इंतेज़ार। नई नफ़रतें नया प्यार। नई ख़बरें नए-नए अख़बार। और नई सम्भावनाएँ अगली सुबह होने की। - रिज़वान रिज़

महबूब शहर.. दिल्ली By Rizwan Riz

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मैं केवल तुमसे प्यार नहीं करता। तुम्हारे शहर से भी उतनी ही मुहब्बत करता हूँ, जितनी तुमसे। ये बात मुझे आज ही रेलवे-स्टेशन पे पता चली। हालांकि ऐसा सुनना तुम्हें अच्छा न लगे। मगर मुझे आज दिल्ली को छोड़ते हुए ऐसा ही महसूस हो रहा है। मुझे समझ नहीं आता किसका ग़म ज़्यादा है, तुमसे दूर होने का या दिल्ली के छूट जाने का। ख़ैर, ये शहर भी तो तुम्हारा ही है। तुम्हारी बहुत-सी यादें, बहुत-सी बातें हमारा बचपन, और ज़िंदगी का एक शायद सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा छुपा है, इस दिल्ली में। और क्या तुम जानती हो इतनी सारी यादों, कहानियों और अनुभव के बाद  मेरा दिल भी दिल्ली जैसा हो चुका है। तुम चाहो तो इसमें आकर रह सकती हो ये भी तो आख़िर तुम्हारा ही घर है। - रिज़वान रिज़

शिकायत है By Rizwan Riz

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राम को रहीम से और रहीम को राम से शिकायत है। होनी भी चाहिए क्योंकि ये दोनों बरसों-बरस के साथी रहे हैं। ऐसे साथी जिनको एक-दूसरे से अलग कर पाना मुश्क़िल है। उतना ही मुश्क़िल, जितना ख़ुद को ख़ुद से अलग करना। मगर आज राम ने रहीम को, रहीम न कहकर मुसलमान कह दिया और रहीम भी उसको हिंदू कहते हुए दूसरी तरफ जाकर बैठ गया है। अब दोनों इस बात को सोच रहे हैं कि हम दोनों को आख़िर हिंदु-मुसलमान किसने बना दिया, हम तो बरसों से केवल राम और रहीम थे। - रिज़वान रिज़

सब याद रक्खा जाएगा By Rizwan Riz

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ये नफरतें, मुहब्बतें ये सिरफिरी सियासतें। ये दूरियाँ, मज़बूरियाँ ये दुःखद कहानियाँ। सब याद रक्खा जाएगा। अमीर लोग, ग़रीब लोग भूखे लोग, प्यासे लोग तड़पते लोग, बिलखते लोग मज़दूर लोग, मज़बूर लोग और सड़को पे दम तोड़ते लोग सब याद रक्खा जाएगा। ये नम आँखे मासूमों की ये नन्हें पैरों में छाले। सपने लिए घर जाने के ये भूखे पेट, प्यासे गले। ये बेबसी, ये बे-क़दरी और ये सरकारों की चुप्पी सब याद रक्खा जाएगा। ये झूठे वादों की सरकार ये नफ़रतों से भरे अख़बार ये दलाली करती मीडिया सच छुपाती, झूठ दिखाती नफ़रत फैलाती मीडिया। और आग लगाती मीडिया। सब याद रक्खा जाएगा। - रिज़वान रिज़

लौट आना आसान होता है By Rizwan Riz

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लौट आना आसान होता है उस वक़्त जब कोई देखता हो राह तुम्हारी और जलाये रखता हो इक दिया वापसी की उम्मीद में तुम्हारे लौट आने की। और भी आसानी हो जाती है वापसी में जो वो अगर ढूँढता आ जाए तुमको तुम तक और कहे प्यार से. आओ फिर से देखते हैं सपने साथ-साथ। -रिज़वान रिज़