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Showing posts from November, 2019

कुछ तुम कुछ हम दूर हो गए By Rizwan Riz

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कुछ तुम कुछ हम दूर हो गए। वक़्त के हाथों मज़बूर हो गए। अंधेरी रात में देखे सपने कई। उजाले में सब चूर-चूर हो गए। मैं उनको मनाता कैसे आख़िर। वो दौलती अब मग़रूर हो गए। शौक़ तो हमें भी था जीने का। इन्सां थे मौत का दस्तूर हो गए। -रिज़वान रिज़

इंतेज़ार By Rizwan Riz

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हम कबसे आस लगाए बैठे हैं। वो अबतक मुँह फुलाए बैठे हैं। काश.! वो आएँ मिलने और हाल पूँछें हमारा उनके इंतेज़ार में हम पलकें बिछाए बैठे हैं। यूँ लगता है मेरी गली से न आएँगे वो इस क़दर खफ़ा हैं मुझसे वो। उनके  स्वागत की ख़ातिर हम पड़ोस की गली सजाए बैठे हैं। दिल कहता है आएँगे वो फिर कहता है शायद न भी आएँ।  बस इसी उलझन में हम घबराए बैठे हैं। अरसा हुआ अब तो उनसे मिले ‛रिज़वाँ' न जाने किस बात को वो दिल से लगाए बैठे हैं। हम कब से आस लगाए बैठे हैं। वो अब तक मुँह फुलाए बैठे हैं। - रिज़वान रिज़

इक रोज तुम मिले थे By Rizwan Riz

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इक रोज तुम मिले थे अजनबी बनके। और अब तुम ही तुम हो ख़्वाबों और हक़ीक़त में। मेरे अपनों में और सपनों में। अब तो तुम्हारे लिए ही धड़कता है ये दहर। तुम ही तुम बस नज़र आते हो मैं देखता हूँ जिधर। अँधेरों में, उजालों में। मेरे ख़्यालों में बस तुम ही तुम हो..। -रिज़वान रिज़ आभार : गूगल प्ले, कुकू एफ एम।

पहला स्पर्श By Rizwan Riz

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कितना नया और अनोखा था, बिल्कुल बारिश की बूँदों-सा पवित्र तुम्हारे और मेरे हाथों का पहला स्पर्श। जैसे ओंस की दो बूँदें सरकती हुई आ मिलती हैं इक-दूजे से, किसी पत्ते पर और जैसे मिल ही जाती हैं सागर में दो लहरें आपस में, होकर बैचैन। सचमुच बिल्कुल ऐसा था तुम्हारे और मेरे हाथों का वो पहला स्पर्श। -रिज़वान रिज़

नींद By Rizwan Riz.

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हम अक्सर खो देते हैं हर रोज़ हर रात अपने ही वजूद को। हम खो देते हैं सच को। और खो जाते हैं उन झूठे सपनों में.. जिनका नहीं होता ख़ुद का ही वजूद। हम खो देते हैं अक्सर अपने तन-मन और ध्यान को हर बार सोने के बाद। इसमें कुछ भी झूठ नहीं है सचमुच अल्पकालिक मौत-सी होती है नींद। -रिज़वान रिज़

चलते हैं जब कभी तनहा By Rizwan Riz

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चलते हैं जब भी कभी तनहा तेरी याद आ जाती है पहले तो मुस्कुराते हैं हम फिर उदासी छा जाती है। हर बार सोचता हूँ भूल जाऊँ अब तुझे ज़रा-सी देर नहीं होती कोई न कोई तेरी अदा याद आ जाती है। चलती है जब भी कभी अँधरे में ठंडी हवा तेरे साथ वो बरसात की रात याद आ जाती है। कभी खोलता हूँ कभी बंद करता हूँ आँखे सोचता हूँ राहत मिलेगी तेरी यादों से पर तू तो जैसे कोई ख़्वाब है नींदों में आ जाती है। निकलते हैं रोज़ दीदार-ए-मेहबूब की ज़ानिब कोई न कोई आफ़त रस्ते में आ जाती है अब तो यूँ जी रहे हैं अरसों से "रिज़वाँ" कभी-कभी नहीं आती कभी साँस आ जाती है। -रिज़वान रिज़

कुछ ख़्वाबों के लिए By Rizwan Riz

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कुछ ख़्वाबों के लिए सपने तो नहीं तोड़ सकता अजनबी आज मिले हैं काल फिर मिलेंगे इनके लिए अपने तो नहीं छोड़ सकता। तुम रहते हो संगेमरमर के अलिसां मकानों में, तो रहो मैं इनके लिए घर तो नहीं छोड़ सकता। आज ये आसमाँ भी शिकारी-सा लगता है हर तरफ जाल बिखरे हैं मगर मैं मस्त परिंदा हूँ अपनी उड़ान तो नहीं छोड़ सकता। वो अँधेरों से डराते हैं मुझे जिन्हें सिर्फ़ उजाले अच्छे लगते हैं मगर मैं जलता दीपक हूँ अपनी तली तो नहीं छोड़ सकता। कल किसी ने ये कहा था 'रिज़वाँ' तुम अच्छा लिखते हो तब से कुुुछ बेचैन हूँ पर अब लिखना तो नहीं छोड़ सकता। -रिज़वान रिज़

अचानक By Rizwan Riz

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अच्छा लगता है जब अचानक से आती है आवाज़ किसी मासूम के रोने की जो आया हो अभी-अभी इस संसार में। जब अचानक से आता है कोई मिलने बरसों बाद हमसे जो रहता हो साथ हमारे कभी पहले साये की तरह। जब देखते हुए बादलों की तरफ अचानक से शुरू हो जाती है बारिश और देखते ही देखते भीग जाते हैं हम पूरे के पूरे। जब किसी की तलाश में हो आँखें और वो आ जाए अचानक से इनके सामने किसी तरीके से। जब कोई हाथ बढ़ता है अचानक से उस मज़बूर की तरफ मदद को जो बस खोने ही वाला था आस ख़ुदा के वज़ूद की। अचानक से कोई दे देता है साथ हमारा जब सब समझ लेते हैं ग़लत हमको। जब कोई दुआ अचानक से हो जाती है क़ुबूल जो मांगी थी अभी-अभी बस कुछ देर पहले। जब अचानक से हो जाता है प्यार इक नज़र देखकर किसी को। और हो जाते हैं हम किसी और के। कितना अच्छा लगता है जब सबकुछ यूँ अचानक से होता है। -रिज़वान रिज़

उदास हर दिन हर शाम तनहा-तनहा है By Rizwan Riz

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उदास हर दिन, हर शाम तनहा-तनहा है किस तरह बताएँ अब, रात का आलम। हर तरफ़ तुम हो बस, कुछ और नहीं है हम नहीं जानते, क़ायनात का आलम। जब कोई हँसता है, तुम महसूस होते हो यहाँ तक है तुम्हारी, मुस्कान का आलम। न कोई सावन, न बहार बाक़ी है अब दिल क्या जाने किसी, बरसात का आलम। अगर तुम मिलो तो, हर ग़म जुदा हो तुम क्या जानो 'रिज़वाँ' मुलाक़ात का आलम। -रिज़वान रिज़

बचपन By Rizwan Riz

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उस दिन जो गिरी अचानक दीवार से इक तस्वीर ले गई मुझे बरसों पीछे मेरे बचपन में। पहले तो शक-सा हुआ मुझे मेरे चेहरे पर सोचने लगा लिए हाथ में वो तस्वीर बचपन की सचमुच ऐसा था मैं मेरे बचपन में। मानों वो तस्वीर न थी बचपन की पूरी कहानी थी खो गया मैं उन कहानियों में जो माँ मुझे सुनाती थी मेरे बचपन में। याद आई वो बचपन की मस्ती बारिश के पानी में डूबती कभी तैरती हमारी कागज़ की कश्ती वो लड़ते-झगड़ते स्कूल को जाना कुछ झूठे कुछ सच्चे बहाने बनाना आदतें थीं कुछ ये मेरी मेरे बचपन में। दोपहरी में जाकर तालाब में नहाना तपते सूरज से आँखें लड़ाना ठहरे हुए पानी में फेंकते हुए पत्थर बचपन के यारों से गप्पे लड़ाना सोये हुए कुत्ते को बेवज़ह जगाना और फिर घबरा के भाग जाना कितना मज़ा आता था मेरे बचपन में। इतना ही सोच पाया था बचपन के बारे में तभी अचानक पीछे से आवाज़ आई इक प्यारे-से बच्चे ने आवाज़ लगाई फिर से गिरी हाथों से तस्वीर यूँ लगा कितना दूर गया मेरा बचपन उस मासूम-से बच्चे की आँखों में मैंने फिर से महसूस किया मेरा बचपन। -रिज़वान रिज़

दिल के राज़ खुलकर बताता कौन है By Rizwan Riz

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दिल के राज़ खुलकर, बताता कौन है। बेवज़ह  की उलझन, बढ़ाता  कौन है। झूठे  चेहरे अक्सर  मीठी बातें करते हैं। ज़ख्म पे सच्चा मरहम लगाता कौन है। ग़नीमत है अभी तक तो सब ख़ामोश हैं। देखना है, मेरे दर्द पे  मुस्कुराता कौन हैं। कोई चेहरा न याद बाक़ी है अब ज़हन में। हर रात मेरी नींदों में, फिर आता कौन है। बड़ा नाबाक़िफ़ है वो, ख़ुदा की ख़ुदाई से। पूँछता है के, दुनिया को  चलाता कौन है। तुम  यहाँ से जाओ, या जहाँ  से 'रिज़वाँ' भला किसी के लिए आँसू बहाता कौन है। -रिज़वान रिज़

लोग दीवाने बन जाते हैं By Rizwan Riz

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आँखों से आँखें मिलती हैं अफ़साने बन जाते हैं ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. लोग दीवाने बन जाते हैं। पीत-ज्वर-सा चढ़ जाता है प्रेम ये हमको कभी-कभी उसकी आँखें नीली लगती हैं हम पीले पड़ जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. लगता है कह देंगें सबकुछ दिल में अरमाँ जो भी हैं जब वो सामने आ जाती है हम शर्मीले बन जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. वो सबसे सुंदर लगती है जो मेरे दिल मे बसती है उसकी बातें सिर-आँखों पर गुलाम हम उनके बन जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. बेमौसम बरसात होती है जब वो मेरे साथ होती है मौसम भी उम्दा होता है काँटें फूल-से बन जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. उसका चेहरा ताजमहल-सा आँखें सचमुच झील-सी हैं मैं उसका रांझा लगता हूँ वो भी मेरी हीर-सी है मैं बस उसकी तारीफें लिखता हूँ मेरे लफ्ज़ तराने बन जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. प्यार में सबकुछ अच्छा लगता है झूठा भी सच्चा लगता है दिल उसकी ही ज़िद करता है कभी-कभी तो बच्चा लगता है हम भी बच्चे बन जाते हैं। ज़रा-ज़रा-सी बातों में.. कभी-कभी तो ऐसा होता है दिलबर मेरे दिल में सोता है रातें हसीन हो ...

हम तो टूट ही चुके हैं By Rizwan Riz

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हम तो टूट ही चुके हैं, इसे तो जुड़ा रहने दो मुफ़्त में सूख जाएगा डाली से लगा रहने दो। बेशक़ मर रहा हूँ मगर ज़िंदा भी उसी से हूँ उसका भूत मेरे सिर पे चढ़ा रहने दो। उसकी ख़ुशबू मुझे बुलाती है यहाँ बार-बार कुछ देर और मुझे यहाँ खड़ा रहने दो। मैं एक को मनाता हूँ दूसरा रूठ जाता है इससे बेहतर है जो सड़ा है सड़ा रहने दो। तकल्लुफ़ नहीं ये हमारे यहाँ का रिवाज़ है मेरे बड़े अभी बैठे हैं मुझे खड़ा रहने दो। ये लोगों की दुनिया है आख़िर 'रिज़वाँ' कोई कुछ भी कहे उसे कहता रहने दो। -रिज़वान रिज़

इस तरह इंसानियत की हार नहीं होती By Rizwan Riz

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इस  तरह  इंसानियत की हार नहीं होती अच्छा होता मुल्क़ में सरकार नहीं होती। मेरा दुश्मन कभी मुझको जाँ से प्यारा था जंग से पहले,  वरना मेरी हार नहीं होती। वो घर अक्सर मुहब्बत की गवाही देते हैं जहां आँगन के बीच में दीवार नहीं होती। ज़रूर कोई ख़बरी है हमारे बीच में वरना ज़रा-ज़रा-सी बातें यूँ अख़बार नहीं होतीं। हम शायर हैं, सिर्फ़ कलम से वास्ता हमको शायरों के हाथ में कभी तलवार नहीं होती। आसाँ मत समझो सफ़र-ए-ज़िंदगी 'रिज़वाँ' कोई राह मुसाफ़िर की वफ़ादार नहीं होती। -रिज़वान रिज़ ***Poetry contains writer's views not targets any political party or sentiments.

इस तरह तो ज़िंदगी नहीं जी सकते By Rizwan Riz

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इस तरह तो ज़िंदगी नहीं जी सकते। ऐं मौत! हम तेरे बिना नहीं जी सकते। ताउम्र हमें बस तेरा इंतेज़ार ही रहा है। आजाओ के अब और नहीं जी सकते। ये सच्ची ज़ुबाँ हैं इस दिल में बग़ावत है। देखके सबकुछ होंठों को नहीं सी सकते। बेचारे समंदरों की ज़रा बेबसी तो देखो। सदियों से प्यासे हैं, पानी नहीं पी सकते। ©  रिज़वान रिज़

इश्क़ की राह में सबकुछ लुटाना पड़ता है By Rizwan Riz

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इश्क़ की राह में सबकुछ लुटाना पड़ता है ख़ुश्क आँखों से दरिया बहाना पड़ता है। दीदार-ए-महबूब रोग ही कुछ ऐसा है वो बुलाएं न बुलाएं, हमें जाना पड़ता है। डर रहता है आँखें कहीं नम न हो जाएं रो-रो के उनकी छाती कहीं कम न हो जाए। उनके लबों की मुस्कुराहट की ख़ातिर दर्द-ए-दिल में भी हमें मुस्कुराना पड़ता है। मुहब्बत में मज़ा बहुत है, ये खेल निराला है इसमे कभी रूठना कभी मनाना पड़ता है। रातभर छिपाते हैं राज़-ए-दिल उनसे सहर नहीं होती कि, सबकुछ बताना पड़ता है। उनकी हर बात सिर-आँखों पे होती है अनचाही बातों को भी अपनाना पड़ता है। ज़िंदगी से कोई वादा हो तो मुकर भी जाएं वादा-ए-वफ़ा हो तो, हरगिज़ निभाना पड़ता है। हम जानते हैं मुहब्बत और ज़हर में फ़र्क 'रिज़वाँ' मगर पिलाने वाला अपना हो तो.. इस बारीक़ी को ज़रा छिपाना पड़ता है। -रिज़वान रिज़

ख़ामोशी By Rizwan Riz

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अभी सुबह होने ही वाली थी सब नज़ारे ठहरे-से थे, मानों कोई रोके हुए था, उजालों को हर तरफ़ अँधेरे के पहरे-से थे। कई पेड़ सो रहे थे कुछ तो नींद में उलझे थे, शायद हवा चाहती थी जगाना कहाँ मगर वो सुनते थे। नीले-काले अम्बर में इक चाँद दिखाई देता था, हाँ, वो कुछ ज्यादा चमक रहा था पर कुछ और सितारे चमक रहे थे। सूरज अभी नहीं जगा था पंछी कुछ ना गाते थे, तालाब, पेड़ सब जीव-जंतु इक मौन को धारण करते थे। इक अद्भुत-सा एहसास था उस दिन जब निकला रात को मैं खुशी-खुशी में हर पल इतना शांत था जैसे डूब गया हो संसार ही सारा ख़ामोशी में। - रिज़वान रिज़

क्लासमेट By Rizwan Riz

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सचमुच अनोखे होते हैं कुछ लोग हर किसी की ज़िंदगी में। जिस तरह से तुम हो शामिल मेरी ज़िंदगी में। सोचते हैं क्या नाम दें इस रिश्ते को क्योंकि ये प्यारा है कहीं ज्यादा किसी साधारण-सी दोस्ती से और फिर तुम मेरी महबूबा भी तो नहीं हो। कई बार ये सोचता हूँ तुम हो सिर्फ़ मेरी क्लासमेट मगर दिल नहीं मानता इस फॉर्मल-से रिश्ते को। और समझने लगता है तुम्हें बेहद करीबी जिससे शेयर किए जा सकते हैं हज़ारों राज़, हर बात। ख़ैर ये अलग बात है कि तुम्हें देखके नज़रें नहीं हटती एकदम-से तुम पर से। और कई बार राह देखती हैं नज़रें तुम्हें कॉलेज में न पाकर। तुम्हारी मुस्कुराहट और अदाबत सचमुच मिसाल हैं तुम्हारी ज़िंदादिली की। तुम्हारी ये सारी बातें मुझे अक्सर कर देती हैं मज़बूर सोचने पर। मगर मैं रिश्तों की परवाह करने में थोड़ा कच्चा हूँ और तुम्हें समझता हूँ केवल एक सच्ची क्लासमेट। -रिज़वान रिज़